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| भिलाई सेक्टर-6 के नशीली गोलियों के मामले में अदालत ने बी. पवन कल्याण को संदेह का लाभ देकर बरी किया। |
यह मामला 15 दिसंबर 2024 का है। पुलिस के मुताबिक आयकर भवन, सेक्टर-6 के पास नशीली गोलियां बेचने की सूचना मिली थी। कार्रवाई के दौरान बी. पवन कल्याण को पकड़ा गया और उसके पास से अल्प्राजोलम की 1280 गोलियां बरामद होने का दावा किया गया। इसी आधार पर अपराध क्रमांक 510/2024 दर्ज किया गया।
मामले में बरामद गोलियों के वजन को लेकर भी महत्वपूर्ण अंतर सामने आया। पुलिस ने जब्ती के समय 1280 गोलियों का वजन 153.06 ग्राम दर्ज किया था। बाद में न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने हुई गिनती और जांच के दौरान इन्हीं 1280 गोलियों का वजन 294.98 ग्राम दर्ज हुआ। दोनों रिकॉर्ड के बीच 141.92 ग्राम का अंतर था, जिसका संतोषजनक स्पष्टीकरण अभियोजन अदालत के सामने नहीं दे सका।
हाईकोर्ट के रिकॉर्ड में भी 1280 गोलियों के 61 पट्टियों में बरामद होने और उनका वजन 294.98 ग्राम दर्ज होने का उल्लेख है। हालांकि, ट्रायल के दौरान बरामदगी और जब्त सामग्री से जुड़ी प्रक्रिया को लेकर कई सवाल सामने आए।
अभियोजन के दोनों स्वतंत्र गवाह राधेश्याम और प्रदीप कुमार ठाकुर ने पुलिस की कार्रवाई का पूरी तरह समर्थन नहीं किया। इसके अलावा गोलियों का वजन करने वाले व्यक्ति और मालखाने के मुंशी को भी अभियोजन पक्ष ने गवाह के रूप में पेश नहीं किया।
मामले में FIR से पहले तैयार किए गए दस्तावेजों को लेकर भी अदालत के सामने सवाल आया। FIR 15 दिसंबर को शाम 5.21 बजे दर्ज की गई थी, जबकि पुलिस के अनुसार मौके पर तैयार किए गए तौल पंचनामा, नमूना सील पंचनामा और जब्ती पत्रक में पहले से ही अपराध क्रमांक 510/2024 दर्ज था। अदालत में यह सवाल उठा कि FIR दर्ज होने से पहले मौके पर तैयार दस्तावेजों में अपराध क्रमांक कैसे दर्ज हो गया।
नमूने लेने की प्रक्रिया भी विवाद का हिस्सा बनी। पुलिस ने बरामद सभी पट्टियों से नमूने नहीं लिए थे। इसके साथ ही नमूने लेने की कार्रवाई में चार दिन का अंतर सामने आया।
मुखबिर से मिली सूचना को वरिष्ठ अधिकारी तक पहुंचाने की प्रक्रिया को लेकर भी पुलिस के बयान और दस्तावेजों में एकरूपता नहीं मिली। अदालत ने विवेचना के दौरान कुल 11 खामियों को ध्यान में रखा।
इन परिस्थितियों में अभियोजन आरोपी के खिलाफ आरोपों को अदालत में साबित नहीं कर सका। इसके बाद विशेष न्यायाधीश सुनीता टोप्पो की अदालत ने बी. पवन कल्याण को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। बचाव पक्ष की ओर से अधिवक्ता ज्ञान प्रकाश दांडेकर ने पैरवी की।
