![]() |
| वार्ड आरक्षण के बाद रिसाली भाजपा में टिकट दावेदारों के समीकरण बदले। |
सूत्रों के दावे के मुताबिक, भाजपा सरकार बनने के बाद रिसाली में एल्डरमैन पद की दौड़ में करीब 350 कार्यकर्ताओं के नाम अलग-अलग स्तर पर चर्चा में रहे हैं। कई वार्डों में पांच से सात तक संभावित दावेदारों के नाम सामने आने की बात भी कही गई है। अब वार्ड आरक्षण ने इनमें से कई दावेदारों के लिए राजनीतिक रास्ता और कठिन कर दिया है।
भाजपा में लंबे समय से एल्डरमैन नियुक्ति को लेकर उम्मीद बनी हुई थी। आसपास के कुछ नगरीय निकायों में नियुक्तियां होने के बाद रिसाली के कार्यकर्ताओं को भी अपनी बारी आने की उम्मीद थी। इसी वजह से कई कार्यकर्ता संगठन में सक्रिय बने रहे और संभावित सूची में अपना नाम बनाए रखने की कोशिश करते रहे।
लेकिन वार्ड आरक्षण ने इस पूरी राजनीतिक गणित को बदल दिया है। जिन नेताओं को एल्डरमैन के जरिए नगर निगम की राजनीति में प्रवेश की उम्मीद थी, उनमें से कुछ के लिए अब अपने ही वार्ड से पार्षद चुनाव लड़ने का रास्ता भी आरक्षण के कारण आसान नहीं रह गया है।
ऐसे दावेदारों के सामने दूसरे वार्ड से चुनाव लड़ने का विकल्प मौजूद है, लेकिन यह रास्ता भी सीधा नहीं माना जा सकता। जिस वार्ड में पहले से स्थानीय दावेदार टिकट की उम्मीद लगाए बैठे हैं, वहां बाहर से आने वाले चेहरे को मौका मिलने पर संगठन के सामने असंतोष संभालने की चुनौती खड़ी हो सकती है।
हर वार्ड से एक ही प्रत्याशी को टिकट मिलना है और दावेदारों की संख्या अधिक है। ऐसे में टिकट वितरण के दौरान स्थानीय कार्यकर्ताओं की भूमिका और प्रतिक्रिया भी भाजपा के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है।
दावेदारों के सामने परिवार के किसी सदस्य या करीबी को चुनाव मैदान में उतारने का विकल्प भी हो सकता है। हालांकि, किसी करीबी को प्रत्याशी बनाना और स्वयं पार्षद का चुनाव लड़ना राजनीतिक रूप से अलग-अलग स्थिति है। इसलिए आरक्षण के बाद बदले समीकरणों में हर दावेदार के सामने अपनी राजनीतिक रणनीति तय करने की चुनौती है।
वहीं, जिन वर्तमान पार्षदों और दावेदारों के लिए वार्ड आरक्षण अनुकूल दिखाई दे रहा है, उनके सामने भी टिकट हासिल करने की चुनौती बनी हुई है। कहा जा रहा है कि ऐसे कुछ दावेदार अनुकूल आरक्षण आने के बावजूद खुलकर खुशी जाहिर करने से बच रहे हैं, क्योंकि इससे दूसरे दावेदारों में नाराजगी पैदा होने की आशंका है।
इस तरह रिसाली भाजपा के भीतर स्थिति कुछ अलग दिखाई दे रही है। जिनका वार्ड आरक्षण के लिहाज से अनुकूल है, वे टिकट को लेकर चिंतित हैं, जबकि जिनका वार्ड आरक्षण की वजह से चुनावी समीकरण से बाहर हुआ है, वे अपने लिए दूसरे राजनीतिक विकल्प तलाशने की स्थिति में हैं।
अब भाजपा के सामने चुनौती केवल कांग्रेस के खिलाफ चुनावी मुकाबले की नहीं है। पार्टी को टिकट वितरण से पहले अपने ही दावेदारों के बीच संतुलन बनाना होगा। किसे टिकट दिया जाएगा, किसे समझाया जाएगा और टिकट नहीं मिलने के बाद कौन संगठन के फैसले को स्वीकार करेगा, इन सवालों का असर आगे की रणनीति पर पड़ सकता है।
रिसाली में कांग्रेस के पुराने चेहरों के समीकरण भी वार्ड आरक्षण से प्रभावित हुए हैं। ऐसे में दोनों प्रमुख दलों में टिकट वितरण के बाद ही चुनावी तस्वीर अधिक स्पष्ट होने की उम्मीद है।
एल्डरमैन पद की उम्मीद लगाए बैठे भाजपा कार्यकर्ताओं के लिए यह स्थिति खास तौर पर महत्वपूर्ण है। यदि एल्डरमैन नियुक्ति नहीं होती और आरक्षण के कारण पार्षद चुनाव का रास्ता भी किसी दावेदार के लिए बंद हो जाता है, तो संगठन के सामने ऐसे कार्यकर्ताओं की नाराजगी संभालने की चुनौती हो सकती है।
करीब ढाई साल से चली आ रही एल्डरमैन पद की उम्मीद अब टिकट की राजनीति से जुड़ गई है। आरक्षण की तस्वीर सामने आने के बाद अगला बड़ा चरण टिकट वितरण का होगा, जहां भाजपा को दावेदारों की महत्वाकांक्षा, स्थानीय समीकरण और संगठनात्मक संतुलन के बीच फैसला करना होगा।
