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| झीरम घाटी हमले के मामले में NIA की विशेष अदालत ने 10 आरोपियों को दोषी ठहराया। |
भूपेश बघेल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर कहा कि झीरम घाटी की घटना देश के लोकतांत्रिक इतिहास की बड़ी राजनीतिक हिंसक घटनाओं में से एक थी। उनका कहना है कि हमले में बड़ी संख्या में लोगों की कथित भूमिका के बावजूद केवल 10 नक्सलियों की दोषसिद्धि से पूरे मामले के सभी पहलुओं का समाधान नहीं होता।
बघेल ने जांच के दौरान करीब 200 लोगों के हमले में शामिल होने की बात सामने आने का दावा किया। उन्होंने कहा कि NIA ने 39 लोगों को आरोपी बनाया था, लेकिन जांच के दौरान 10 से अधिक आरोपियों को पकड़ा नहीं जा सका। इसी आधार पर उन्होंने सवाल उठाया कि इतने बड़े हमले की जांच का परिणाम केवल 10 दोषियों तक क्यों सीमित रह गया।
पूर्व मुख्यमंत्री ने यह आरोप भी लगाया कि नक्सली संगठन के शीर्ष नेताओं के नाम शुरुआती FIR से हटा दिए गए थे। उन्होंने इस कार्रवाई की परिस्थितियों पर सवाल उठाते हुए मामले की जांच के दायरे को लेकर भी आपत्ति जताई।
बघेल का मुख्य सवाल कथित राजनीतिक षड्यंत्र की जांच को लेकर है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस और पीड़ित परिवार लंबे समय से इस पहलू की अलग और व्यापक जांच की मांग करते रहे हैं, लेकिन उनके अनुसार यह जांच अब तक पूरी तरह नहीं हो सकी है।
उन्होंने जांच आयोग और आपराधिक जांच के बीच अंतर का भी उल्लेख किया। बघेल के मुताबिक, जांच आयोग का उद्देश्य मुख्य रूप से घटना के दौरान सुरक्षा व्यवस्था में हुई चूक की पड़ताल करना था, जबकि आपराधिक साजिश के जिम्मेदार लोगों की पहचान कर उन्हें सजा दिलाना अलग जांच का विषय था।
पूर्व मुख्यमंत्री ने NIA पर भी कथित राजनीतिक षड्यंत्र के पहलू की अपेक्षित जांच नहीं करने का आरोप लगाया। हालांकि, ये दावे बघेल के बयान के रूप में ही सामने आए हैं।
झीरम घाटी मामले में वर्ष 2020 में शहीद उदय मुदलियार के बेटे जितेंद्र मुदलियार की शिकायत के बाद दर्ज दूसरी FIR का मुद्दा भी बघेल ने उठाया। उनके अनुसार, इस FIR को लेकर NIA ने आपत्ति जताई थी और मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था।
बघेल के मुताबिक, नवंबर 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने NIA की आपत्ति खारिज कर दी थी। उन्होंने आरोप लगाया कि इसके बाद राज्य में भाजपा सरकार बनने के बावजूद इस FIR पर अपेक्षित जांच आगे नहीं बढ़ी। उन्होंने कथित आपराधिक षड्यंत्र की जांच को आगे बढ़ाने की मांग दोहराई।
पूर्व मुख्यमंत्री ने वर्ष 2013 में गठित जांच आयोग की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए। उनके अनुसार, आयोग को झीरम घाटी घटना के दौरान सुरक्षा व्यवस्था में हुई खामियों की जांच का दायित्व दिया गया था।
बघेल ने कहा कि जस्टिस प्रशांत मिश्रा जांच आयोग की रिपोर्ट के बाद राज्य सरकार ने रिपोर्ट को अधूरा मानते हुए आगे की प्रक्रिया के लिए जस्टिस मिन्नहाजुद्दीन और जस्टिस सतीश अग्रिहोत्री के नेतृत्व में नया जांच आयोग गठित किया था।
उन्होंने दावा किया कि भाजपा के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष धरमलाल कौशिक इस आयोग के खिलाफ हाईकोर्ट पहुंचे थे, जिसके बाद आयोग की कार्रवाई पर रोक लगा दी गई और यह रोक अब तक प्रभावी है।
NIA की विशेष अदालत के फैसले के मुताबिक, मामले में प्रमिला मोडियम, चैतू लेकाम उर्फ मुन्ना, सुमित्रा उर्फ सुमित्रा पुनेम मोडियम, मुक्का मांडवी, कोसा कवासी उर्फ कोसाराम, आयता मरकाम, मदकामी देवा, जोगा मदकामी, बनजामी सन्ना उर्फ चमरू उर्फ डेंगा और महादेव नाग दोषी ठहराए गए हैं।
मामले में कुल 11 आरोपियों के खिलाफ सुनवाई चल रही थी। सुनवाई के दौरान एक आरोपी की मौत हो गई, जिसके बाद शेष 10 आरोपियों को अदालत ने दोषी करार दिया। अब अदालत 16 सितंबर को सजा पर फैसला सुनाएगी।
बचाव पक्ष के वकील अरविंद चौधरी ने फैसले को चुनौती देने के लिए सुप्रीम कोर्ट जाने की बात कही है। इससे मामले की आगे की कानूनी प्रक्रिया पर भी नजर रहेगी।
झीरम घाटी हमला 25 मई 2013 को हुआ था। उस समय छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव की तैयारियां चल रही थीं और कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा प्रदेश में निकाली जा रही थी।
सुकमा में सभा के बाद कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं का काफिला जगदलपुर की ओर लौट रहा था। काफिले में करीब 25 वाहन और लगभग 200 नेता व कार्यकर्ता शामिल बताए गए थे। झीरम घाटी पहुंचने पर नक्सलियों ने पेड़ गिराकर रास्ता रोक दिया और वाहनों के रुकने के बाद हमला किया।
इस हमले में तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, उनके बेटे दिनेश पटेल और वरिष्ठ कांग्रेस नेता महेंद्र कर्मा समेत कई लोगों की मौत हुई थी। बस्तर के कांग्रेस प्रभारी उदय मुदलियार सहित अन्य नेता और कार्यकर्ता भी हमले में मारे गए थे।
NIA की विशेष अदालत के फैसले से झीरम घाटी मामले की कानूनी प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण चरण पूरा हुआ है। वहीं, भूपेश बघेल की ओर से उठाए गए सवालों ने कथित राजनीतिक षड्यंत्र और दूसरी FIR की जांच को लेकर बहस को फिर चर्चा में ला दिया है।
अब 16 सितंबर को सजा पर अदालत के फैसले के साथ मामले की अगली कानूनी दिशा स्पष्ट होगी। इसके साथ ही कथित राजनीतिक और आपराधिक षड्यंत्र की व्यापक जांच को लेकर उठ रही मांगों पर भी नजर रहेगी।
NIA की विशेष अदालत के फैसले के मुताबिक, मामले में प्रमिला मोडियम, चैतू लेकाम उर्फ मुन्ना, सुमित्रा उर्फ सुमित्रा पुनेम मोडियम, मुक्का मांडवी, कोसा कवासी उर्फ कोसाराम, आयता मरकाम, मदकामी देवा, जोगा मदकामी, बनजामी सन्ना उर्फ चमरू उर्फ डेंगा और महादेव नाग दोषी ठहराए गए हैं।
मामले में कुल 11 आरोपियों के खिलाफ सुनवाई चल रही थी। सुनवाई के दौरान एक आरोपी की मौत हो गई, जिसके बाद शेष 10 आरोपियों को अदालत ने दोषी करार दिया। अब अदालत 16 सितंबर को सजा पर फैसला सुनाएगी।
बचाव पक्ष के वकील अरविंद चौधरी ने फैसले को चुनौती देने के लिए सुप्रीम कोर्ट जाने की बात कही है। इससे मामले की आगे की कानूनी प्रक्रिया पर भी नजर रहेगी।
झीरम घाटी हमला 25 मई 2013 को हुआ था। उस समय छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव की तैयारियां चल रही थीं और कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा प्रदेश में निकाली जा रही थी।
सुकमा में सभा के बाद कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं का काफिला जगदलपुर की ओर लौट रहा था। काफिले में करीब 25 वाहन और लगभग 200 नेता व कार्यकर्ता शामिल बताए गए थे। झीरम घाटी पहुंचने पर नक्सलियों ने पेड़ गिराकर रास्ता रोक दिया और वाहनों के रुकने के बाद हमला किया।
इस हमले में तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, उनके बेटे दिनेश पटेल और वरिष्ठ कांग्रेस नेता महेंद्र कर्मा समेत कई लोगों की मौत हुई थी। बस्तर के कांग्रेस प्रभारी उदय मुदलियार सहित अन्य नेता और कार्यकर्ता भी हमले में मारे गए थे।
NIA की विशेष अदालत के फैसले से झीरम घाटी मामले की कानूनी प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण चरण पूरा हुआ है। वहीं, भूपेश बघेल की ओर से उठाए गए सवालों ने कथित राजनीतिक षड्यंत्र और दूसरी FIR की जांच को लेकर बहस को फिर चर्चा में ला दिया है।
अब 16 सितंबर को सजा पर अदालत के फैसले के साथ मामले की अगली कानूनी दिशा स्पष्ट होगी। इसके साथ ही कथित राजनीतिक और आपराधिक षड्यंत्र की व्यापक जांच को लेकर उठ रही मांगों पर भी नजर रहेगी।
